चिंपैंजी के बसेरों ने दिया मानव जीवन का सुराग
Updated on: Wed, 18 Apr 2012 12:25 PM (IST)
चिंपैंजी के बसेरों ने दिया मानव जीवन का सुराग
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और क्योदो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के एक दल ने पश्चिमी अफ्रीका में गुयाना के निम्बा पहाड़ियों में रहने वाले चिम्पैंजियों के बसेरों का अध्ययन किया।
चिम्पैंजी को अपना बसेरा बनाने में कुछ ही मिनट लगते हैं। वह शाखाओं को तोड़कर उन्हें मोड़कर गोलाकार बनाते हैं और फिर दूसरी शाखा से टिकाकर अपने सोने की जगह बना लेते हैं।
अध्ययन दल के अगुआ डा. काथेलिजने कूप्स के अनुसार ''हमारा मानना है कि आधुनिक बंदरों की तरह चिंपैंजियों के पूर्वज भी 60 लाख साल पहले पेड़ों पर सोते थे। ''
उन्होंने कहा ''लेकिन उनके जमीन के बसेरों के जीवाश्म अथवा पुरातत्व साक्ष्य नहीं होने से यह पता नहीं लग सका कि कब पेड़ों से नीचे आकर जमीन पर सोना उन्होंने शुरू किया। ''
निम्बा के चिंपैंजी मनुष्य का नजदीक आना बर्दाश्त नहीं करते इसलिए दल ने उनके बसेरों से विश्लेषण के लिए बाल एकत्रित करने के लिए नई मालीक्युलर जेनेटिक तकनीक का इस्तेमाल किया।
जर्नल पेलानोटोलाजी एण्ड आर्कियोलाजी में प्रकाशित रिपोर्ट में अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि चिंपैजी जमीन और पेड़ दोनों पर सोते थे लिहाजा पेड़ों से नीचे आने के क्रम में किसी खास विकासात्मक व्यवहार की जरूरत नहीं थी।
इसी तरह हो सकता है कि आदि मानव भी पेड़ पर सोने से पहले जमीन पर सोया हो और बाद में पूरी तरह जमीन पर रहने लगा हो। कूप्स के अनुसार ''यह दिलचस्प खोज है क्योंकि लम्बे समय से माना जाता रहा था कि पेड़ से नीचे आना विकासात्मक बदलाव रहा।''
पेड़ से नीचे आने के विकासात्मक क्रम का एक अन्य सिद्धान्त है आग का इस्तेमाल और फिर पेड़ों की कमी।
अध्ययन दल ने पाया कि जमीन पर सोने के लिए यह दोनों स्थितिया जरूरी नहीं रही होंगी क्योंकि चिंपैजी हरेभरे वर्षावनों में रहते हैं और आग नहीं जलाते। अध्ययन दर्शाता है कि हमारे पूर्वज ही एकमात्र अथवा पहले मानव थे जो पेड़ों से नीचे आकर रहने लगे।
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